Trump Slams NATO Allies Over Iran War: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान के दौरान सहयोग नहीं मिलने पर NATO देशों की खुलकर आलोचना की है। व्हाइट हाउस में NATO महासचिव मार्क रुटे के साथ बैठक के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने ईरान को पहले ही सप्ताह में “पूरी तरह तबाह” कर दिया था और उसे किसी की मदद की जरूरत नहीं थी, लेकिन सहयोगी देशों का समर्थन मिलना चाहिए था।
ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब जुलाई की शुरुआत में NATO शिखर सम्मेलन होने वाला है और अमेरिका तथा यूरोपीय देशों के बीच रक्षा सहयोग, खर्च और सुरक्षा जिम्मेदारियों को लेकर पहले से मतभेद मौजूद हैं। ऐसे में यह विवाद केवल ईरान युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में NATO की दिशा पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
ट्रंप ने NATO सहयोगियों पर क्या आरोप लगाए?
व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में हुई बैठक के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान अकेले ही सफलतापूर्वक पूरा किया। उनके अनुसार अमेरिका को किसी अतिरिक्त सैन्य सहायता की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन NATO सहयोगियों को कम से कम राजनीतिक समर्थन देना चाहिए था।

ट्रंप ने कहा कि अगर सहयोगी देश यह भी कहते कि “हम आपकी मदद करना चाहते हैं”, तो यह अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण संदेश होता। उनका कहना था कि युद्ध जीतने के बावजूद सहयोगियों का सार्वजनिक समर्थन नहीं मिलना निराशाजनक रहा।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि NATO की भूमिका और सहयोगियों के व्यवहार पर वह मार्क रुटे के साथ बंद कमरे में अलग से चर्चा करेंगे।
NATO प्रमुख मार्क रुटे ने ट्रंप को क्या जवाब दिया?
NATO महासचिव मार्क रुटे ने ट्रंप की नाराजगी को पूरी तरह सही नहीं माना। उन्होंने कहा कि युद्ध के दौरान यूरोप में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों से लगभग 4,000 से 5,000 अमेरिकी विमान उड़ान भर रहे थे। उनके अनुसार यह भी NATO सहयोगियों द्वारा दिया गया एक महत्वपूर्ण सहयोग था।
रुटे ने कहा कि कुछ मामलों में ट्रंप की निराशा समझी जा सकती है, लेकिन इसे पूरे NATO गठबंधन की असफलता नहीं कहा जा सकता। उन्होंने यह भी दोहराया कि अमेरिका NATO के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है और जरूरत पड़ने पर यूरोप की रक्षा करेगा।

रुटे ने ट्रंप की तारीफ करते हुए उन्हें “फ्री वर्ल्ड का नेता” भी बताया और ईरान के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई को महत्वपूर्ण बताया।
ईरान ने NATO प्रमुख के बयान पर क्यों जताई नाराजगी?
मार्क रुटे के बयान के बाद ईरान ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि यदि यूरोप के सैन्य अड्डों का इस्तेमाल अमेरिकी अभियान में हुआ, तो यह NATO की “सक्रिय भागीदारी” को दर्शाता है। उन्होंने इसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताया।

ईरान का कहना है कि यदि NATO देशों ने अपने सैन्य ठिकाने उपलब्ध कराए, तो वे केवल दर्शक नहीं बल्कि इस पूरे अभियान का हिस्सा माने जाएंगे।
इटली ने खुद को इस विवाद से अलग क्यों किया?
NATO प्रमुख के बयान के कुछ ही समय बाद इटली ने सफाई जारी की। इटली के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि उसने केवल तकनीकी और लॉजिस्टिक उड़ानों की अनुमति दी थी। किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष सैन्य अभियान के लिए इटली ने अपने सैन्य अड्डों का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी थी।

इटली का कहना है कि रुटे का बयान वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शाता और इससे गलत संदेश गया है।
NATO शिखर सम्मेलन से पहले क्यों बढ़ा विवाद?
यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है जब 7 और 8 जुलाई को तुर्किये की राजधानी अंकारा में NATO शिखर सम्मेलन प्रस्तावित है।
इस बैठक में 32 सदस्य देशों के नेता रक्षा खर्च, यूरोप की सुरक्षा, रूस की चुनौती और अमेरिका की भविष्य की भूमिका पर चर्चा करेंगे।
ट्रंप लंबे समय से NATO देशों पर पर्याप्त रक्षा खर्च नहीं करने का आरोप लगाते रहे हैं। उनका कहना है कि अमेरिका पर अत्यधिक बोझ डाला गया है और अब यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा की अधिक जिम्मेदारी खुद उठानी चाहिए।
इसी वजह से ईरान युद्ध को लेकर दिया गया उनका बयान केवल एक सैन्य अभियान की प्रतिक्रिया नहीं बल्कि NATO की भविष्य की दिशा पर भी दबाव बनाने की रणनीति माना जा रहा है।
अमेरिका और यूरोप के बीच मतभेद क्यों बढ़ रहे हैं?
डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका और कई यूरोपीय सहयोगियों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद बढ़े हैं।
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के पुराने बयान, रक्षा खर्च बढ़ाने की मांग, चीन पर अमेरिका का बढ़ता फोकस और यूरोप में अमेरिकी सैन्य संसाधनों को सीमित करने की योजना पहले ही रिश्तों में तनाव पैदा कर चुकी है।
पेंटागन ने संकेत दिया है कि भविष्य में NATO अभियानों के लिए उपलब्ध अमेरिकी सैन्य संसाधनों में कटौती की जा सकती है। इससे यूरोपीय देशों में यह चिंता बढ़ गई है कि यदि रूस से कोई बड़ा खतरा पैदा हुआ तो अमेरिका पहले जैसी भूमिका निभाएगा या नहीं।
ईरान युद्ध को लेकर यूरोप की अलग राय क्यों रही?
रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई से पहले NATO के भीतर कोई संयुक्त निर्णय नहीं लिया गया था।
यूरोप के कई देशों ने युद्ध की आवश्यकता पर सवाल उठाए थे और कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया था। इसी कारण अधिकांश NATO देशों ने सीधे सैन्य रूप से इस अभियान में शामिल होने से दूरी बनाए रखी।
हालांकि अमेरिकी सैन्य विमानों ने यूरोप में मौजूद कई सैन्य अड्डों का इस्तेमाल किया, लेकिन अधिकांश यूरोपीय सरकारों का कहना है कि यह पहले से मौजूद रक्षा समझौतों के तहत दी गई तकनीकी सुविधा थी, न कि युद्ध में प्रत्यक्ष भागीदारी।
ट्रंप का यह बयान वैश्विक राजनीति के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान केवल ईरान युद्ध तक सीमित नहीं है। इससे साफ संकेत मिलता है कि अमेरिका अपने सहयोगियों से भविष्य में अधिक सक्रिय राजनीतिक और सैन्य समर्थन चाहता है।
यदि NATO के भीतर इस प्रकार के मतभेद बढ़ते हैं, तो इसका असर यूरोप की सामूहिक सुरक्षा, रूस के खिलाफ रणनीति, चीन को लेकर अमेरिकी नीति और वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी पड़ सकता है।
जुलाई में होने वाला NATO शिखर सम्मेलन इस लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वहां इन सभी मुद्दों पर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है।
निष्कर्ष
NATO Allies को लेकर डोनाल्ड ट्रंप का बयान अमेरिका और यूरोप के रिश्तों में मौजूद तनाव को एक बार फिर सामने ले आया है। ट्रंप का मानना है कि ईरान युद्ध के दौरान सहयोगी देशों ने अमेरिका का पर्याप्त साथ नहीं दिया, जबकि NATO प्रमुख मार्क रुटे का कहना है कि यूरोपीय देशों ने अपने सैन्य अड्डों और अन्य व्यवस्थाओं के जरिए सहयोग किया था।
इस विवाद के बाद अब पूरी दुनिया की नजर जुलाई में होने वाले NATO शिखर सम्मेलन पर होगी, जहां यह स्पष्ट हो सकता है कि अमेरिका और उसके सहयोगी आने वाले वर्षों में सुरक्षा और रक्षा सहयोग को किस दिशा में आगे बढ़ाते हैं।
FAQs:
ट्रंप ने कहा कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान के दौरान NATO देशों ने राजनीतिक और सैन्य समर्थन नहीं दिया। उनका मानना है कि सहयोगियों को कम से कम सार्वजनिक रूप से अमेरिका का समर्थन करना चाहिए था।
ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका ने पहले ही सप्ताह में ईरान को भारी नुकसान पहुंचाया और उसे किसी अतिरिक्त सैन्य सहायता की जरूरत नहीं पड़ी।
NATO यानी North Atlantic Treaty Organization एक सैन्य गठबंधन है, जिसकी स्थापना 1949 में सामूहिक सुरक्षा के उद्देश्य से की गई थी। वर्तमान में इसमें 32 सदस्य देश शामिल हैं।
रक्षा खर्च, यूरोप की सुरक्षा, रूस, चीन और अमेरिकी सैन्य जिम्मेदारियों को लेकर लंबे समय से मतभेद बने हुए हैं। ईरान युद्ध पर ट्रंप का बयान इन्हीं तनावों की नई कड़ी माना जा रहा है।
यदि अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच मतभेद बढ़ते हैं, तो इसका असर NATO की एकजुटता, यूरोप की सुरक्षा रणनीति और वैश्विक भू-राजनीतिक संतुलन पर पड़ सकता है।

