Ethanol Water Consumption: भारत में एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम (Ethanol Blending Programme) को देश की ऊर्जा सुरक्षा और तेल आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। सरकार ने जून 2025 में तय समय से पहले 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) का लक्ष्य हासिल कर लिया। अब भविष्य में E85 और E100 जैसे उच्च मिश्रण वाले ईंधनों की दिशा में भी काम चल रहा है।
लेकिन जैसे-जैसे एथेनॉल उत्पादन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे एक दूसरा सवाल भी तेजी से चर्चा में आ रहा है। क्या एथेनॉल वास्तव में हरित ईंधन (Green Fuel) है, या फिर इसे बनाने में लगने वाला भारी पानी भविष्य में भारत के जल संकट को और गंभीर बना सकता है?
हाल के दिनों में एक अध्ययन ने इस बहस को और तेज कर दिया। अध्ययन में दावा किया गया कि चावल से एक लीटर एथेनॉल बनाने के लिए लगभग 10,790 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। इसके बाद एथेनॉल उद्योग से जुड़े संगठनों ने इस दावे पर आपत्ति जताई और कहा कि आधुनिक एथेनॉल संयंत्रों में एक लीटर एथेनॉल बनाने के लिए केवल 3 से 5 लीटर पानी का उपयोग होता है।
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर सही आंकड़ा कौन सा है? इसका जवाब समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि एथेनॉल उत्पादन में पानी की खपत को कैसे मापा जाता है।

एथेनॉल क्या है और भारत में इसका इस्तेमाल क्यों बढ़ रहा है?
एथेनॉल एक प्रकार का अल्कोहल है जो गन्ने, मक्का, चावल और अन्य कृषि उत्पादों से बनाया जाता है। इसे पेट्रोल में मिलाकर वाहनों में ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है।
भारत सरकार लंबे समय से एथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा दे रही है क्योंकि इससे कच्चे तेल के आयात पर खर्च कम होता है, किसानों को अतिरिक्त बाजार मिलता है और कार्बन उत्सर्जन घटाने में मदद मिलती है।
आज एथेनॉल भारत की ऊर्जा रणनीति (Energy Transition) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। तेल विपणन कंपनियां (OMCs) चीनी मिलों और डिस्टिलरी से एथेनॉल खरीदकर उसे पेट्रोल में मिलाती हैं।
हालांकि जैसे-जैसे मिश्रण का स्तर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे एथेनॉल उत्पादन के लिए अधिक फसलों की जरूरत भी बढ़ रही है। यहीं से पानी की खपत को लेकर चिंता शुरू होती है।
Ethanol Water Consumption: एथेनॉल उत्पादन में पानी को लेकर भ्रम क्यों है?
एथेनॉल पर होने वाली बहस का सबसे बड़ा कारण दो अलग-अलग प्रकार के जल उपयोग को एक जैसा मान लेना है।
पहला है प्रोसेस वाटर (Process Water)। यह वह पानी है जो एथेनॉल फैक्ट्री के अंदर उत्पादन प्रक्रिया के दौरान उपयोग होता है। आधुनिक डिस्टिलरी तकनीक के जरिए एक लीटर एथेनॉल बनाने में लगभग 3 से 5 लीटर पानी खर्च करती हैं।
दूसरा है कुल जल पदचिह्न (Total Water Footprint)। इसमें उस पूरी खेती का पानी शामिल होता है जो एथेनॉल बनाने वाली फसल उगाने में खर्च हुआ।

यहीं से आंकड़े हजारों लीटर तक पहुंच जाते हैं। क्योंकि वास्तविकता यह है कि एथेनॉल उत्पादन में सबसे ज्यादा पानी फैक्ट्री नहीं बल्कि खेतों में खर्च होता है।
सरल भाषा में कहें तो डिस्टिलरी में कुछ लीटर पानी लगता है, लेकिन जिस फसल से एथेनॉल बना, उसे उगाने में हजारों लीटर पानी पहले ही खर्च हो चुका होता है।
चावल आधारित एथेनॉल सबसे ज्यादा विवादों में क्यों?
भारत में एथेनॉल उत्पादन के लिए उपयोग होने वाले प्रमुख कच्चे माल में चावल, गन्ना और मक्का शामिल हैं। इनमें सबसे अधिक चिंता चावल आधारित एथेनॉल (Rice-Based Ethanol) को लेकर जताई जा रही है।
उपलब्ध अध्ययनों के अनुसार एक लीटर चावल आधारित एथेनॉल का जल पदचिह्न लगभग 10,790 लीटर तक हो सकता है। इसका कारण यह है कि धान की खेती लंबे समय तक पानी से भरे खेतों में की जाती है, जिससे सिंचाई की जरूरत बहुत अधिक होती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि कई ऐसे क्षेत्र जहां पहले से भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है, वहां ईंधन के लिए चावल का उपयोग जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकता है।
हालांकि एथेनॉल उद्योग का तर्क है कि एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होने वाला काफी चावल अधिशेष (Surplus) या क्षतिग्रस्त खाद्यान्न होता है, जो अन्यथा उपयोग में नहीं आता।
गन्ना और मक्का भी पूरी तरह जल-अनुकूल नहीं
बहस सिर्फ चावल तक सीमित नहीं है। गन्ने से बनने वाले एथेनॉल (Sugarcane Ethanol) का अनुमानित जल पदचिह्न लगभग 3,630 लीटर प्रति लीटर एथेनॉल माना जाता है।
हालांकि यह चावल की तुलना में काफी कम है, लेकिन गन्ना भारत की सबसे अधिक पानी मांगने वाली फसलों में से एक माना जाता है।
इसी तरह मक्का आधारित एथेनॉल (Maize Ethanol) का जल पदचिह्न लगभग 4,670 लीटर प्रति लीटर एथेनॉल बताया जाता है।
मक्का की खेती आमतौर पर चावल से कम पानी मांगती है। इसी कारण सरकार हाल के वर्षों में एथेनॉल उत्पादन के लिए मक्का को बढ़ावा दे रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सही क्षेत्रों में उचित कृषि तकनीकों के साथ मक्का उत्पादन बढ़ाया जाए तो पानी पर दबाव अपेक्षाकृत कम किया जा सकता है।

भारत का जल संकट कितना गंभीर है?
एथेनॉल पर बढ़ती बहस को समझने के लिए भारत की जल स्थिति को भी देखना जरूरी है। विश्व बैंक के अनुसार जब किसी देश में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता 1,000 घन मीटर से नीचे चली जाती है तो उसे जल संकटग्रस्त श्रेणी में माना जाता है।
भारत में 2021 में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता लगभग 1,486 घन मीटर थी। सरकारी अनुमानों के मुताबिक यह 2050 तक घटकर लगभग 1,140 घन मीटर रह सकती है।
यानी देश धीरे-धीरे जल संकट की दिशा में बढ़ रहा है। नीति आयोग (NITI Aayog) पहले ही चेतावनी दे चुका है कि दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई सहित 21 बड़े भारतीय शहरों को भविष्य में भूजल समाप्त होने का खतरा हो सकता है।
ऐसे में जल-गहन फसलों के जरिए ईंधन उत्पादन को लेकर चिंता स्वाभाविक है।
भारत में सबसे ज्यादा एथेनॉल कहां बनता है?
भारत की कुल एथेनॉल उत्पादन क्षमता 2025 के अंत तक लगभग 1,990 करोड़ लीटर तक पहुंच चुकी है। देश में एथेनॉल संयंत्र मुख्य रूप से उन्हीं राज्यों में केंद्रित हैं जहां गन्ना और अन्य कच्चे माल का उत्पादन अधिक होता है।
उत्तर प्रदेश लगभग 250 करोड़ लीटर क्षमता के साथ देश का सबसे बड़ा एथेनॉल उत्पादक राज्य है। इसके बाद महाराष्ट्र लगभग 158 करोड़ लीटर और कर्नाटक लगभग 129 करोड़ लीटर उत्पादन क्षमता के साथ प्रमुख स्थान पर हैं।
बिहार भी करीब 100 करोड़ लीटर क्षमता के साथ तेजी से उभर रहा है। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई राज्य पहले से ही भूजल दोहन और जल संकट की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक पर सबसे ज्यादा नजर क्यों?
महाराष्ट्र भारत का सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक राज्य है। 2025-26 के अनुमान के अनुसार यहां करीब 13 मिलियन टन गन्ना उत्पादन होने की संभावना है।
उत्तर प्रदेश लगभग 10.32 मिलियन टन और कर्नाटक करीब 6.35 मिलियन टन गन्ना उत्पादन के साथ अगले स्थान पर हैं। लेकिन इन राज्यों के कई हिस्सों में जल उपलब्धता पहले से चिंता का विषय है। महाराष्ट्र के कुछ गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में बार-बार सूखे की स्थिति बनती रही है। कर्नाटक के कई जिलों में भी पानी की कमी आम समस्या है। वहीं उत्तर प्रदेश में कृषि और उद्योग दोनों बड़े पैमाने पर भूजल पर निर्भर हैं।
इसी वजह से विशेषज्ञ मानते हैं कि Ethanol Production India को आगे बढ़ाते समय Water Resources Management को समान महत्व देना होगा।
क्या 2G Ethanol बन सकता है समाधान?
जल संकट की चिंता के बीच वैज्ञानिक और नीति निर्माता दूसरे विकल्पों पर भी काम कर रहे हैं। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा दूसरी पीढ़ी के एथेनॉल यानी 2G Ethanol की हो रही है। यह एथेनॉल चावल के पुआल, मकई के अवशेष, गन्ने के कचरे और अन्य कृषि अवशेषों से बनाया जाता है।
चूंकि इसके लिए अलग से फसल उगाने की जरूरत नहीं होती, इसलिए अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता भी काफी कम होती है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में Sustainable Development और Biofuel Policy India के बीच संतुलन बनाने के लिए 2G Ethanol महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम ने निश्चित रूप से भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया है। इससे तेल आयात पर निर्भरता कम करने और किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिली है।
लेकिन दूसरी ओर देश तेजी से जल संकट की ओर भी बढ़ रहा है। यही वजह है कि अब बहस केवल ईंधन की नहीं, बल्कि पानी, कृषि और संसाधन प्रबंधन की भी है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि Renewable Fuel और Green Fuel India की दिशा में बढ़ते कदम भविष्य में जल संसाधनों पर असहनीय दबाव न डालें।
आने वाले वर्षों में एथेनॉल कार्यक्रम की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि कितना एथेनॉल बनाया गया, बल्कि इससे भी मापी जाएगी कि उसे बनाने में कितना पानी खर्च हुआ।
FAQs
Q1. How much water is required to produce ethanol?
फैक्ट्री स्तर पर एक लीटर एथेनॉल बनाने में लगभग 3 से 5 लीटर पानी लगता है। लेकिन यदि फसल की खेती में उपयोग हुए पानी को भी शामिल किया जाए तो चावल आधारित एथेनॉल का जल पदचिह्न 10,790 लीटर प्रति लीटर तक पहुंच सकता है।
Q2. Which Indian states produce the most ethanol?
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार भारत के प्रमुख एथेनॉल उत्पादक राज्यों में शामिल हैं।
Q3. Why is ethanol blending important for India?
एथेनॉल मिश्रण से तेल आयात कम होता है, किसानों को अतिरिक्त आय मिलती है और कार्बन उत्सर्जन घटाने में मदद मिलती है।
Q4. What are the environmental concerns related to ethanol production?
सबसे बड़ी चिंता पानी की खपत, भूजल दोहन और जल-गहन फसलों की बढ़ती खेती को लेकर है।
Q5. How does ethanol impact water resources?
यदि एथेनॉल उत्पादन के लिए अधिक मात्रा में चावल और गन्ने जैसी फसलें उगाई जाती हैं, तो इससे भूजल और सिंचाई संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

